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क्या मैं हूँ, क्या मैं हूँ नहीं??
समझ आज भी नहीं पाता, क्या मैं हूँ या क्या मैं हूँ नहीं।
पूछता हूँ अपने आप से, क्या मैं हूँ सही या मैं सही नहीं।
उहापोह थी तब ज़िंदगी की, जो भागती जा रही थी बड़ी रफ़्तारें से,
वो सारे स्टेशन छूट गये, करना था जिनका दीदार बड़े एतबार से।
दर्द झलकता है जब पटल पर, भरा मन और भीग जाती हैं पलकें कभी,
सवाल कौंधता है बार बार मन में, क्या मैं सही हूँ या मैं सही नहीं।
वक्त लेता है इम्तहान बड़ा, बेवक्त की अनगढ़ चुनौतियाँ कर के खड़ी,
टटोल कर ढूँढना पड़ता है अपने वज़ूद को, क्या मैं हूँ, क्या मैं हूँ नहीं।
कभी लगता है, भाग कर जा पहुँचूँ फिर उन्हीं वक्त के स्टेशनों पर मैं,
ढ़ूँढू उन गुमे हुए चेहरों को, और खुशनसीब हो जाऊँ उन को फिर लगाकर मैं।
(C) Peeyush Verma |
समझ आज भी नहीं पाता, क्या मैं हूँ या क्या मैं हूँ नहीं।
पर असल में ऐसा कुछ होता है नहीं, जो होता है सही, दिखता है वही,
भावनाओं को छोड़ पगले, आत्मबल से पूछ अपने वो है सही या है नहीं
भरोसा कर अपने आप पर, तू जो है नहीं, वो नहीं और जो है, वही है सही।