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Monday, 16 September 2019

जिंदगी की परिभाषा

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कभी सोचो...............
जिंदगी की यह भाग दौड़,
आज यहाँ, कल वहाँ....
आज ये, कल वो........
कितना ज़रूरी है जो
जिंदगी को जिंदगी बनाने के लिए,





कभी सोचो ......................
कितनी दौलत चाहिए तुम्हें, सुकून से जीने के लिए
कमाते कमाते थक जाओगे,
कहीं धरी की धरी रह जाएगी,
और घर भर जायेगा कबाड़ से, और शरीर अनगिनत रोगों से,
आज की बड़ी नियामत है, तंदरुस्त सेहत और खुशनुमा मन,
इससे बड़ी दौलत भी नहीं आज,
कभी सोचो,
क्या है ये दौलत तुम्हारे पास...........
??



कभी सोचो...........
जिंदगी को चाहिए क्या ? 
दो पल का सुकून और एक स्वस्थ शरीर,
जो अपने आपको अंत तक संभाल सके;
उस अंतिम यात्रा के लिए,
जिसमें चाहे अनचाहे सबको जाना ही है। 

कभी सोच कर देखो.....
भागो उतना जितना ज़रूरी है शरीर के लिए,
लो उतना ही, जो ज़रूरी है जिंदगी के लिए;
दो “आत्मा” को वो तृप्ति, जो ‘उसे’ दिव्य अनुभव दे,
चेतना का पुंज दे, आरोग्य का भाव दे,
शांति का सरोकार दे, खुद पर विश्वास दे.......
वहीं मिलता है दो पल का सुकून और 
एक स्वस्थ शरीर, जिसमें बसती है,
एक दिव्य पुण्यात्मा। 
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