Thursday, 6 October 2022

हमारा अस्तित्व

जीवात्मा का जीवात्मा से प्रेम प्रकृति का नियम है और जीवित अवस्था में यह रिश्तों नातों में दिखाई देता है। किसीपरिजन के मृत्यु के उपरांत उसके शरीर से प्रेम हमारे मन का भ्रम है। आत्मा स्वतंत्र हैचेतनामय है और अतीन्द्रिय हैजोजन्म जन्मों तक अपनी यात्रा निरंतर करती रहती है। एक आत्मा का दूसरी आत्माओं से संबंध स्वाभाविक होता है और फिरशरीर स्थूल हो या सूक्ष्म शरीर वह अपने संबंधों को पूरे स्नेह और सम्मान से संजोती है। सूक्ष्म में आत्मा ज़्यादा प्रखर और प्राणवान होती है। अपना शरीर छोड़ने के उपरांत ज़्यादा प्रखर और चेतनामय होकर अपने प्रियजनों और समाज का मार्गदर्शन करती है। अपने प्रियजनों के दुःख से उसकी ऊर्जा का शनैः शनैः ह्वास होता है और प्रियजनों के निरंतर मिलनेवाले दुःखों से वह निश्तेज़ होकर प्रेत योनि में चली जाती है। वहाँ नाना प्रकार की दुष्ट आत्माएँ उसकी शक्ति निरंतर क्षीण करती हैं। इसीलिए अपने प्रियजन के जाने का निरंतर शोक करना उचित नहीं है। यह व्याख्या वेदों और पुराणों में दर्ज है। 

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